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एक अपील

ऐ घर पे बैठे तमाशबीन लोग लुट रहा है मुल्क, कब तलक रहोगे खामोश शिकवा नहीं है उनसे, जो है बेखबर पर तु तो सब जानता है, मैदान में क्यों नही...

Friday, 24 April 2015

सियासी साजिशें

इन सियासत के गलियारों ने,
इंसानों को बाँट दिया
इनकी सियासी साजिशों ने
इंसानियत का गला काट दिया

सियासी साजिशों की
बहुत गहरी है जड़े
धरती के कई कोनों में
अभी भी बिखरी है धड़े

मौत के खेल की
कैसी है ये आजमाइश
धरती को लाल देखने की
जैसे किसी ने की हो फरमाइश

महज एक सियासी जीत के लिए
बलि चढ़ गई हजारों की
नफरत की दीवार खड़ी हो गई
दो इंसानों के बीच पहाड़ों सी

डरता हूँ नफरत की आग
कहीं इतनी ना फ़ैल जाय
इंसानियत तो निगल ही रहा
कही दुनिया ना निगल जाय 

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