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एक अपील

ऐ घर पे बैठे तमाशबीन लोग लुट रहा है मुल्क, कब तलक रहोगे खामोश शिकवा नहीं है उनसे, जो है बेखबर पर तु तो सब जानता है, मैदान में क्यों नही...

Saturday, 9 November 2013

मुर्दों का शहर

ये मुर्दों का शहर है या बेफिक्रों का,
लोग मिलते है लाशों की तरह,
जबां पे लगा लिए है ताले ,
और पूछते है इतना सन्नाटा क्यों है ?

मेहनत करती है लाशें दिलोजान से,
मेहनताना छीन ले जाता है क़ातिल,
मुफ़लिसी में दिन कटते है लाशों के,
क़ातिल का दिन अय्याशी में गुजरता क्यों है ?

इनको लगता है कि क़ातिल रहते है आसमां में,
उनको जमीं पे लाना है नामुमकिन,
एक पत्थर भी उछाले नहीं है,
और कहते है आसमां इतना ऊँचा क्यों है ?

मै बाशिंदा हूँ उस शहर का,
जहाँ जिंदा कौमें दहाड़ती है,
इंसान के साये को भी पुकारती है,
ये शहर कहता है मुझसे तु इतना बोलता क्यों है ?

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